चंद लफ्ज़, कुछ शायरी (सन- 2015 – पहला साल)

1.  “क्या मिला तुझे इन आँखों में झाँक के
यह वो झरोखे हैं,
जो बयान करते हैं,
बताते नहीं.”

 

2. “उसने आँखों में धूल भी इतनी सफाई से झोंकी,
ना आँखें नम हुई, ना आँखें बंद हुई”

 

 

3. “मेरी हर एक चीज़ में तू समाया है,
सोचता हूँ,
तूने मुझे, या मैंने तुझे बनाया है”

 

 

4. कभी किसी को अपना खुद इतना भी मत बनाओ,
वो पत्थरदिल ,पत्थर बनकर खुद दुआ मांगता है..

 

5. वो झूठी तारीफें करके,
बारीकी से बाज़ी जीत गया.

 

 

6. अगर कीमत एहसास की होती,
तो मैं इन्सान को खरीद लेता,
या वह मुझे.

 

 

7. अपनों से अच्छे तो गैर होते हैं ..
उसका दिल ना दुःख जाए,
सोचते तो हैं …

 

8. “काश इतनी इंसानियत लेके पैदा हुआ होता इंसान,
बस गरीब के फर्क को,
अपना फ़र्ज़ समझ लेता,
तो बात अलग होती . . .”

 

 

9. शायद उसकी साजिश थी,
जो दिल का वो दर्द आज भी नम पड़ा है ..

 

 

10. “वो उसका हुनर था,
जिसे लोग बेवफाई का क़रार दे गए”

 

 

11. “है ये ऐसा दस्तूर,
अँधा है जहां गुरूर
वो जो किस्तमत के मारे है,
फितरत वो ही पढ़ पाते हैं”

 

12. उस श्याम, ज़िन्दगी का ज़िक्र हुआ,
मैंने कुछ बयां करना चाहा,
उन्होंने रोक दिया,
कहा,
तुमने अभी देखा ही क्या है ?
मैं थम गया,
सोच की गहराई में सहम गया,
हाँ आखिर,
इस ग़म ने वक़्त के सिवा दिखाया भी क्या है ?

 

 

13.  मैं तो कहूँगा ये अपने ही चेहरे हैं,
जिसके लिए पहले रो देते थे,
आज फरक नहीं पड़ता।

 

 

14. वक़्त और हालात सबसे पहले उसूल ही खरीदते हैं।

 

 

15. जब तक मुझे परवाह थी, क्या तब मेरी परवाह थी ?

 

 

16. इश्क़ में दर्द का वज़न क्या ही है, साहब।
हमने किसी के एहसान तले भी दबकर देखा है।

 

 

17.   “जैसा भी कह लो, कोस  लो, समझ लो ‘कबीर’,
मेरा ज़िक्र गूंजेगा हमेशा इन्हीं दीवारों में।”

 

 

 

18. इस ज़ालिम दुनिया ने मुझे लिखना सिखा दिया ‘कबीर’,
वो एक शक्स ही मेरी दुनिया था।

 

 

19. “एक बात अपने ज़हन में उतार लेना,
इंसान हूँ, बूख लगती है,
बस इज़्ज़त की दो रोटी के साथ,
हक़ की दाल खाना चाहता हूँ।’

 

 

20. कभी टूटे हुए आईने के उन टुकड़ों में गौर से देखना।
वो बिखरे हुए चेहरे ही समेट देंगे तुम्हें।

 

 

21. चहरे कभी बेनकाब नहीं होते,
वक्त आने पर लोग नकाब बदल लेते हैं।

 

 

22. आजकल लोगों के पास वक्त बहुत कम है,
वक़्त पर काम आने वाले,
एहसान जता जाते हैं।

 

 

23.  “पता  है  नकाब  तो  मैंने  भी  पहना  हुआ है  दुनिया  में  जीने  के  लिए,
घुलने  मिलने  के  लिए  रंग  बदलने  पड़ते  हैं”

 

24. यूँ तो हताश हैं अपनी दुनिया से लोग,
और कहने को ख्वाब हैं,
इस दुनिया से बाहर वोह कई सारी दुनिया देखने का।

 

 

25. वो मेहनत की दो रोटियां गरीब का पेट क्या ही भरेंगी,
एक निवाला, दो बड़े लोगों के साथ और वो मुस्कुराती आँखें काफी है।

 

 

26. लोग मुझसे पूछते हैं की हमारे बारे में कुछ बताओ ज़रा,
आईने से साफ़ भी कोई और बता सकता है भला ?

 

 

27. हम यहाँ ज़रूरत-ए-शौंक की सूची लिखते रहे,
और वोह खामोशी से अपनी ज़रूरतों का गला घोटता रहा।

 

 

28.  ज़रा संभल कर चलना ज़िन्दगी की राहों पर, ऐ दोस्त,
चुभन कांटो से नहीं, फेंके गए पत्थरों से होती है।

 

 

29. वोह महफ़िल जमाने के बहाने आज कतल करने ही आये थे,
अलफ़ाज़ भी किसी की जान लिया करते हैं, क्या ?

 

 

30. मुझसे मेरा मज़हब मत पूछो,
बताने को अब कुछ रहा नहीं।

 

 

 

31. जो बीत गया, उसे जाने दो,  गड़े मुर्दे मत उखाड़ना,
दफ़न करने के लिए मुझे फिर एक और कब्र खोदनी पड़ेगी।

 

 

32. काश मैं तुम्हे खुद की गलतियों से सीखा पाता,
समझ नहीं आता गलतियों को वक़्त से वफ़ा है,
या वो उसकी मौहताज हैं।

 

 

33. ज़हर पीने से अब मौत नसीब नहीं मुझे,
लोगों ने कड़वे घुट बहुत पिलाए हैं।

 

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