खाली पन्नें . . .

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“एक अरसे बाद तुम्हारी याद आई,

ज़माना कब बदल गया महसूस ही नहीं हुआ।



शायद भूल गया था मैं कि

कुछ यादों में अभी जान बाकी है

उन लमहों की,

जिन्हें अफ़साना बनने की

तमन्ना थी।



लेकिन अब,

पुराने अफसानों को कौन पूछता है

किताब वही पुरानी है

मगर जो खाली पन्नें

तुम छोड़ गयी थी बीच में,

मैंने उन पुराने पन्नों पर

नई तारीख डाल दी है।

अब तारीख देख कर

ज़माने का पता लगा लेता हूँ मैं।

मेरा वक़्त तो गुज़र गया, खैर

कुछ पुराने एहसास ही थाम लेता हूँ मैं।



ऐसे ही अब ज़िन्दगी काट लेता हूँ मैं।

पन्ने पलट-पलट कर

अलग-अलग किरधार निभा लेता हूँ मैं।



इन किरदारों की कहानी अजब है थोड़ी,

सब बेज़ुबान हैं।

अब सिर्फ़ एक याद बनकर

सिसकते हैं मेरे ज़हन में।



और तुम,

तुमने तो ये किताब अधूरी ही छोड़ दी थी,
आज भी जिनके खाली पन्नों पर
मैं ये कहानियाँ लिख रहा हूँ।”

– Kabir Malik
13th Jan, 2016

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