आदतें. . .

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“आदत के बाद दर्द भी देने लगा मज़ा,

वक़्त की वफ़ा अब मुझसे है खफ़ा

मीठा ये ज़हर, बेअसर अब होने लगा,
नमक ज़ख्म से भला मुँह क्यों फेरने लगा,
सोचा, ज़हर से ही अब ज़ख्म भर लूँ मैं अपने
आहट से सिसकियों का घोट दूँ मैं गला।


आदत के बाद दर्द भी देने लगा मज़ा,

मेरी सज़ा नहीं, जीने का है ये मेरा सलीखा ।

~ Kabir Malik
09th Jan, 2016

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