एहसास . . .

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“एक बस एहसास ही तो हैं
जो रह जाता है
उमर साथ गुज़ारने के लिए।
फिर एक बार
गुज़रते वक़्त को थामने के लिए।
उधड़े हुए भरोसे को
बाँधने के लिए।
ज़िन्दगी के खाली, काली जगहों पर 
रंग भरने के लिए।

जैसे किसी सूने कमरे
की अनसुनी गूँज,
है यह एहसास।

जैसे किसी बचपन की 
खिलखिलाती हंसी की पुकार,
है यह एहसास।

जैसे घड़ी की टिक-टिक से 
पुरानी यादों में चाबी भर जाती है,
है वो एहसास ।

जैसे अगली सुबह में
उम्मीद रौशनी से नहीं,
ज़िन्दगी से हो,
हैं वो एहसास।

जैसे उस शाम में
वक्त को थामने वाले
वो बेज़ुबां ख्याल,
है वो एहसास।

जैसे हर रात अँधेरे में
मेरे कान ढूँढ़ते हैं,
उन पलों की आवाज़,
बस वो ही तो है,
है वो एहसास. . . . “

~ Kabir Malik
20th December, 2015

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