ख़लिश

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“इन सरसराती हवाओं में
ज़िन्दगी की ख़लिश है,
वाकिफ करा देती हैं जो,
उस गुज़रे हुए हर एक पल से।
हलकी सीे इस रौशनी में,
आग तो अभी भी जल रही है,
लेकिन सन्नाटा है,
और वोह सहमी हुई।
ये ठंडी हवाएँ भी,
इसे बुझाना चाहती हैं।
बस गुज़रते हुए सफ़र में,
मशाल जलती रहे,
अँधेरे रास्ते की सोच गहरी है,
और यह सफ़र बहुत लंबा।”

~कबीर मलिक
4th October, 2015

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