“यह कैसा सौदा है ज़िन्दगी?”

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यह कैसा सौदा है, ज़िन्दगी ?

जहाँ बचपन की कीमत दौलत कमा के चुकाई है,
ख़ुशी के लम्हें उन बंद कमरों में बिताये हैं।

वोह ख्वाब ज़िम्मेदारियों के बदले गवाए हैं,
और जहां मंज़िल के साथ-साथ तनहाई पाई है।

यह कैसा सौदा है ज़िन्दगी ?

वक़्त की  रफ़्तार में पल गवाता गया,
दुश्मन थे नहीं,
दोस्त भुलाता गया।

परिवार में दो लोग थे,
दिन-रात की मेहनत में,
उनसे भीे अलग हो गए।

यह कैसा सौदा है ज़िन्दगी ?

जहाँ आंसुओं का पलड़ा तूने खुशियों से भारी रखा,
और अगले पड़ाव पर पहुँचने के लिए,
अपनों को खोने का ये खेल,
तूने जारी रखा।

है तुझे क्या पता ?
घुटन है तेरी इस हवा में,
जो थोडा बहुत था,
पूरा कर दिया उस बेवफा ने।

आखिर, ये कैसा सौदा है ज़िन्दगी ?

बस एक आवाज़ मेरी भी थी,
उसमें छुपी एक आस मेरी भी थी,
मैंने ख्वाब संजोये थे,
कम से कम,
मुझे हकीकत तो दे देती।

~Kabir Malik
3rd October, 2015

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